ज़िंदगी भी अजीब दास्तां हैं, खुशी तो लबो पर हैं परंतु मन में उदासी हैं।
लोगों का क्या उन्हें तो बस!
समाज में रहना हैं तो या अपनो के बीच में रहना हैं तो मुस्कुराना पढ़ेगा! चाहें वह हसीं खुशी की हों या गम की हंसना तो होगा।
पर मैंने काफ़ी उदासी वाली हसीं में हंसना लोगों देखा हैं समझा हैं जो हसीं मन से निकलें वह दिल तक छूं जाती हैं। और जो हसीं मात्र होटों से मुस्करा दे वह दिल से बहुत ही दुःखी होती हैं।
जब भी फ़ोन पर किसी से बात करो तो सबसे पहले यह पूछा जाता हैं, की आप कैसे हो उनसे अक्सर झूठ बोलना पड़ता हैं की मज़े में हूं। शायद अगले बंदे को यह सुनकर खुशी होती या क्या सोचता होगा पता नहीं।
मेरा अपना मानना यह हैं कि जीतने भी लोग कहते फिरते हैं कि मैं बहुत खुश हूं लेकिन उतने खुश वह होते नहीं हैं।
वह अंदर से उतने ही दुःखी रहते हैं जितना वह अपने आप को खुश दिखाने की कोशिश करते हैं।
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